कबीर साहेब Vs ज्योति निरंजन, परमात्मा का सन्देश- Exclusive Report

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महामुर्ख दयानन्द और ‘सत्यानाश प्रकाश’ की पोल खोल – भाग 03

नियोग (भाग-1)

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास के क्रम सं0 120 से 149 तक की सामग्री पुनर्विवाह और नियोग विषय से संबंधित है। लिखा है कि

पुनर्विवाह और नियोग :-

द्विजों यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में पुनर्विवाह कभी नहीं होने चाहिए। (4-121)

स्वामी जी ने पुनर्विवाह के कुछ दोष भी गिनाए हैं जैसे –

(1) पुनर्विवाह की अनुमति से जब चाहे पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष छोड़कर दूसरा विवाह कर सकते हैं।
(2) पत्नी की मृत्यु की स्थिति में अगर पुरुष दूसरा विवाह करता है तो पूर्व पत्नी के सामान आदि को लेकर और यदि पति की मृत्यु की स्थिति में स्त्री दूसरा विवाह करती है तो पूर्व पति के सामान आदि को लेकर कुटुम्ब वालों में झगड़ा होगा।
(3) यदि स्त्री और पुरुष दूसरा विवाह करते हैं तो उनका पतिव्रत और स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाएगा।
(4) विधवा स्त्री के साथ कोई कुंवारा पुरुष और विधुर पुरुष के साथ कोई कुंवारी कन्या विवाह न करेगी। अगर कोई ऐसा करता है तो यह अन्याय और अधर्म होगा। ऐसी स्थिति में पुरुष और स्त्री को नियोग की आवश्यकता होगी और यही धर्म है। (4-134)

किसी ने स्वामी जी से सवाल किया कि

 अगर स्त्री अथवा पुरुष में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है और उनके कोई संतान भी नहीं है तब अगर पुनर्विवाह न हो तो उनका कुल नष्ट हो जाएगा। पुनर्विवाह न होने की स्थिति में व्यभिचार और गर्भपात आदि बहुत से दुष्ट कर्म होंगे। इसलिए पुनर्विवाह होना अच्छा है। (4-122)

जवाब दिया गया कि

 ऐसी स्थिति में स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य में स्थित रहे और वंश परंपरा के लिए स्वजाति का लड़का गोद ले लें। इससे कुल भी चलेगा और व्यभिचार भी न होगा और अगर ब्रह्मचारी न रह सके तो नियोग से संतानोत्पत्ति कर ले। पुनर्विवाह कभी न करें। 

आइए अब देखते हैं कि ‘नियोग’ क्या है ?



“अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है और उसके कोई संतान नहीं है तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर संतान उत्पन्न कर सकता है। गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी। ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है। “

(यहाँ यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि कन्या उत्पन्न होती है तो नियोग की क्या ‘शर्ते रहेगी ?)

 “इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है। ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।”

इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)

भावार्थ ः ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’ (4-125)

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समाज विनाशक दयानन्द – सत्यार्थ प्रकाश की पोल-खोल- भाग-02

 ‘नियोग’ क्या है ?



‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास के क्रम सं0 120 से 149 तक की सामग्री पुनर्विवाह और नियोग विषय से संबंधित है। लिखा है कि

द्विजों यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में पुनर्विवाह कभी नहीं होने चाहिए। (4-121)

स्वामी जी ने पुनर्विवाह के कुछ दोष भी गिनाए हैं जैसे –

(1) पुनर्विवाह की अनुमति से जब चाहे पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष छोड़कर दूसरा विवाह कर सकते हैं।
(2) पत्नी की मृत्यु की स्थिति में अगर पुरुष दूसरा विवाह करता है तो पूर्व पत्नी के सामान आदि को लेकर और यदि पति की मृत्यु की स्थिति में स्त्री दूसरा विवाह करती है तो पूर्व पति के सामान आदि को लेकर कुटुम्ब वालों में झगड़ा होगा।
(3) यदि स्त्री और पुरुष दूसरा विवाह करते हैं तो उनका पतिव्रत और स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाएगा।
(4) विधवा स्त्री के साथ कोई कुंवारा पुरुष और विधुर पुरुष के साथ कोई कुंवारी कन्या विवाह न करेगी। अगर कोई ऐसा करता है तो यह अन्याय और अधर्म होगा। ऐसी स्थिति में पुरुष और स्त्री को नियोग की आवश्यकता होगी और यही धर्म है। (4-134)

किसी ने स्वामी जी से सवाल किया कि अगर स्त्री अथवा पुरुष में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है और उनके कोई संतान भी नहीं है तब अगर पुनर्विवाह न हो तो उनका कुल नष्ट हो जाएगा। पुनर्विवाह न होने की स्थिति में व्यभिचार और गर्भपात आदि बहुत से दुष्ट कर्म होंगे। इसलिए पुनर्विवाह होना अच्छा है। (4-122)

जवाब दिया गया कि 

ऐसी स्थिति में स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य में स्थित रहे और वंश परंपरा के लिए स्वजाति का लड़का गोद ले लें। इससे कुल भी चलेगा और व्यभिचार भी न होगा और अगर ब्रह्मचारी न रह सके तो नियोग से संतानोत्पत्ति कर ले। पुनर्विवाह कभी न करें। 

आइए अब देखते हैं कि ‘नियोग’ क्या है ?


अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है और उसके कोई संतान नहीं है तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर संतान उत्पन्न कर सकता है। गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी।
 ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है। 

(यहाँ यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि कन्या उत्पन्न होती है तो नियोग की क्या ‘शर्ते रहेगी ?) 

इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है। ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।

इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)

भावार्थ ः ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’ (4-125)

वेद की आज्ञा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णस्थ स्त्री और पुरुष दस से अधिक संतान उत्पन्न न करें, क्योंकि अधिक करने से संतान निर्बल, निर्बुद्धि और अल्पायु होती है। जैसा कि उक्त मंत्र से स्पष्ट है कि नियोग की व्यवस्था केवल विधवा और विधुर स्त्री और पुरुषों के लिए नहीं है बल्कि पति के जीते जी पत्नी और पत्नी के जीते जी पुरुष इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। (4-143)

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृराावन्नजामि।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्।
(ऋग्वेद 10-10-10)

भावार्थ ः ‘‘नपुंसक पति कहता है कि हे देवि! तू मुझ से संतानोत्पत्ति की आशा मत कर। हे सौभाग्यशालिनी! तू किसी वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले। तू मुझ को छोड़कर अन्य पति की इच्छा कर।’’

इसी प्रकार संतानोत्पत्ति में असमर्थ स्त्री भी अपने पति महाशय को आज्ञा दे कि हे स्वामी! आप संतानोत्पत्ति की इच्छा मुझ से छोड़कर किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके संतानोत्पत्ति कीजिए।

अगर किसी स्त्री का पति व्यापार आदि के लिए परदेश गया हो तो तीन वर्ष, विद्या के लिए गया हो तो छह वर्ष और अगर धर्म के लिए गया हो तो आठ वर्ष इंतजार कर वह स्त्री भी नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती है। ऐसे ही कुछ नियम पुरुषों के लिए हैं कि अगर संतान न हो तो आठवें, संतान होकर मर जाए तो दसवें और कन्या ही हो तो ग्यारहवें वर्ष अन्य स्त्री से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकता है। पुरुष अप्रिय बोलने वाली पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्री से नियोग का लाभ ले सकता है। ऐसा ही नियम स्त्री के लिए है। (4-145)

प्रश्न सं0 149 में लिखा है कि
 अगर स्त्री गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए और पुरुष दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो ऐसी स्थिति में दोनों किसी से नियोग कर पुत्रोत्पत्ति कर ले, परन्तु वेश्यागमन अथवा व्यभिचार कभी न करें। (4-149)

लिखा है कि
 नियोग अपने वर्ण में अथवा उत्तम वर्ण और जाति में होना चाहिए। एक स्त्री 10 पुरुषों तक और एक पुरुष 10 स्त्रियों तक से नियोग कर सकता है। अगर कोई स्त्री अथवा पुरुष 10वें गर्भ से अधिक समागम करे तो कामी और निंदित होते हैं।(4-142) 

विवाहित पुरुष कुंवारी कन्या से और विवाहित स्त्री कुंवारे पुरुष से नियोग नहीं कर सकती।



पुनर्विवाह और नियोग से संबंधित कुछ नियम, कानून, ‘शर्ते और सिद्धांत आपने पढ़े जिनका प्रतिपादन स्वामी दयानंद ने किया है और जिनको कथित लेखक ने वेद, मनुस्मृति आदि ग्रंथों से सत्य, प्रमाणित और न्यायोचित भी साबित किया है।
 व्यावहारिक पुष्टि हेतु कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी कथित लेखक ने प्रस्तुत किए हैं और साथ-साथ नियोग की खूबियां भी बयान की हैं। इस कुप्रथा को धर्मानुकूल और न्यायोचित साबित करने के लिए लेखक ने बौद्धिकता और तार्किकता का भी सहारा लिया है। 

कथित सुधारक ने आज के वातावरण में भी पुनर्विवाह को दोषपूर्ण और नियोग को तर्कसंगत और उचित ठहराया है। आइए उक्त धारणा का तथ्यपरक विश्लेषण करते हैं।

ऊपर (4-134) में पुनर्विवाह के जो दोष स्वामी दयानंद ने गिनवाए हैं वे सभी हास्यास्पद, बचकाने और मूर्खतापूर्ण हैं। 

विद्वान लेखक ने जैसा लिखा है कि दूसरा विवाह करने से स्त्री का पतिव्रत धर्म और पुरुष का स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाता है परन्तु नियोग करने से दोनों का उक्त धर्म  सुरक्षित रहता है। क्या यह तर्क मूर्खतापूर्ण नहीं है ? 
आख़िर वह कैसा पतिव्रत धर्म है जो पुनर्विवाह करने से तो नष्ट और भ्रष्ट हो जाएगा और 10 गैर पुरुषों से यौन संबंध बनाने से सुरक्षित और निर्दोष रहेगा ?

अगर किसी पुरुष की पत्नी जीवित है और किसी कारण पुरुष संतान उत्पन्न करने में असमर्थ है तो इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि उस पुरुष में काम इच्छा नहीं है। अगर पुरुष के अन्दर काम इच्छा तो है मगर संतान उत्पन्न नहीं हो रही है और उसकी पत्नी संतान के लिए किसी अन्य पुरुष से नियोग करती है तो ऐसी स्थिति में पुरुष अपनी काम तृप्ति कहाँ और कैसे करेगा ?

 यहाँ यह भी विचारणीय है कि नियोग प्रथा में हर जगह पुत्रोत्पत्ति की बात कही गई है, जबकि जीव विज्ञान के अनुसार 50 प्रतिशत संभावना कन्या जन्म की होती है। कन्या उत्पन्न होने की स्थिति में नियोग के क्या नियम, कानून और ‘शर्ते होंगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया है ?

जैसा कि स्वामी जी ने कहा है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो भी पुरुष नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न कर सकता है।
यहाँ यह तथ्य विचारणीय है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो इसके लिए स्त्री नहीं, पुरुष जिम्मेदार है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव जाति में लिंग का निर्धारण नर द्वारा होता है न कि मादा द्वारा।

यह भी एक तथ्य है कि पुनर्विवाह के दोष और हानियाँ तथा नियोग के गुण और लाभ का उल्लेख केवल द्विज वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए किया गया है। चैथे वर्ण ‘शूद्र को छोड़ दिया गया है। 

क्या ‘शुद्रों के लिए नियोग की अनुमति नहीं है ? 
क्या ‘शूद्रों के लिए नियोग की व्यवस्था दोषपूर्ण और पाप है ?

जैसा कि लिखा है कि अगर पत्नी अथवा पति अप्रिय बोले तो भी वे नियोग कर सकते हैं। अगर किसी पुरुष की पत्नी गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए अथवा पति दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो दोनों कहीं उचित साथी देखकर नियोग कर सकते हैं। 

क्या यहाँ सारे नियमों और नैतिक मान्यताओं को लॉकअप में बन्द नहीं कर दिया गया है ? क्या नियोग का मतलब स्वच्छंद यौन संबंधों ;ैमग थ्तमम) से नहीं है ? क्या इससे निम्न और घटिया किसी समाज की कल्पना की जा सकती है?

कथित विद्वान लेखक ने नियोग प्रथा की सत्यता, प्रमाणिकता और व्यावहारिकता की पुष्टि के लिए महाभारत कालीन सभ्यता के दो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। 
लिखा है कि व्यास जी ने चित्रांगद और विचित्र वीर्य के मर जाने के बाद उनकी स्त्रियों से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की। अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और एक दासी से विदुर की उत्पत्ति नियोग प्रक्रिया द्वारा हुई। 
दूसरा उदाहरण पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री का है। पाण्डु के असमर्थ होने के कारण दोनों स्त्रियों ने नियोग विधि से संतान उत्पन्न की। इतिहास भी इस बात का प्रमाण है।

जहाँ तक उक्त ऐतिहासिक तथ्यों की बात है महाभारत कालीन सभ्यता में नियोग की तो क्या बात कुंवारी कन्या से संतान उत्पन्न करना भी मान्य और सम्मानीय था। वेद व्यास और भीष्म पितामह दोनों विद्वान महापुरुषों की उत्पत्ति इस बात का ठोस सबूत है। 

दूसरी बात महाभारत कालीन समाज में एक स्त्री पांच सगे भाईयों की धर्मपत्नी हो सकती थी। पांडव पत्नी द्रौपदी इस बात का ठोस सबूत है। तीसरी बात महाभारत कालीन समाज में तो बिना स्त्री संसर्ग के केवल पुरुष ही बच्चें पैदा करने में समर्थ होता था।

महाभारत का मुख्य पात्र गुरु द्रोणाचार्य की उत्पत्ति उक्त बात का सबूत है। चैथी बात महाभारतकाल में तो चमत्कारिक तरीके से भी बच्चें पैदा होते थे। पांचाली द्रौपदी की उत्पत्ति इस बात का जीता-जागता सबूत है। 
अतः उक्त समाज में नियोग की क्या आवश्यकता थी ? 
यहाँ यह भी विचारणीय है कि
• व्यास जी ने किस नियमों के अंतर्गत नियोग किया ? 
•दूसरी बात नियोग किया तो एक ही समय में तीन स्त्रियों से क्यों किया? 
•तीसरी बात यह कि एक मुनि ने निम्न वर्ण की दासी के साथ क्यों समागम किया ? 
•चैथी बात यह कि कुंती ने नियम के विपरीत नियोग विधि से चार पुत्रों को जन्म क्यों दिया ? 

विदित रहे कि कुंती ने कर्ण, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन चार पुत्रों को जन्म दिया और ये सभी पाण्डु कहलाए। पांचवी बात यह कि जब उस समाज में नियोग प्रथा निर्दोष और मान्य थी तो फिर कुंती ने लोक लाज के डर से कर्ण को नदी में क्यों बहा दिया ?
 छठी बात यह है कि वे पुरुष कौन थे जिन्होंने कुंती से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की ? 

स्वामी जी ने बहुविवाह का निषेध किया है जबकि उक्त सभ्यता में बहुविवाह होते थे। अब क्या जिस समाज से स्वामी जी ने नियोग के प्रमाण दिए हैं, उस समाज को एक उच्च और आदर्श वैदिक समाज माना जाए ?

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के ‘शंका-समाधान परिशिष्ट में पं0 ज्वालाप्रसाद द्वारा नियोग प्रथा के समर्थन में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। 

लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में कुलनाश के भय से ऋषि-मुनि, विद्वान, महापुरुषों से नियोग द्वारा वीर्य ग्रहण कर उच्च कुल की स्त्रियां संतान उत्पन्न करती थी।
जो प्रमाण पंडित जी ने प्रस्तुत किए हैं वे सभी महाभारत काल के हैं। क्या महाभारत काल ही प्राचीन वैदिक काल था ? क्या नियोग ही ऋषियों का एक मात्र प्रयोजन था?
यहाँ यह तथ्य भी विचारणीय है कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती नियोग को एक वेद प्रतिपादित और स्थापित व्यवस्था मानते थे तो उन्होंने इस परंपरा का खुद पालन करके अपने अनुयायियों के लिए आदर्श प्रस्तुत क्यों नहीं किया ? इससे स्वामी जी के चरित्र को भी बल मिलता और एक मृत प्रायः हो चुकी वैदिक परंपरा पुनः जीवित हो जाती। 

यह भी एक अजीब विडंबना है कि जिस वैदिक मंत्र से स्वामी जी ने नियोग परंपरा को प्रतिपादित किया है उसी मंत्र से अन्य वेद विद्वानों और भाष्यकारों ने विधवा पुनर्विवाह का प्रतिपादन किया है। 

निम्न मंत्र देखिए –

‘‘कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः।
को वां ‘ात्रुया विधवेव देवरं मंर्य न योषा कृणुते सधस्य आ।।
(ऋग्वेद, 10-40-2)

‘‘उदीष्र्व नार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुप ‘ोष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिशोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ।।’’
(ऋग्वेद, 10-18-8)

उक्त दोनों मंत्रों से जहाँ स्वामी दयानंद सरस्वती ने नियोग प्रथा का भावार्थ निकाला है वहीं ओमप्रकाश पाण्डेय ने इन्हीं मंत्रों का उल्लेख विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में किया है। 

अपनी पुस्तक ‘‘वैदिक साहित्य और संस्कृति का स्वरूप’’ में उन्होंने लिखा है कि वेदकालीन समाज में विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह की अनुमति प्राप्त थी। उक्त मंत्र (10-18-8) का भावार्थ उन्होंने निम्न प्रकार किया है –
‘‘हे नारी ! इस मृत पति को छोड़कर पुनः जीवितों के समूह में पदार्पण करो। तुमसे विवाह के लिए इच्छुक जो तुम्हारा दूसरा भावी पति है, उसे स्वीकार करो।’’

इसी मंत्र का भावार्थ वैद्यनाथ ‘शास्त्री द्वारा निम्न प्रकार किया गया है –
‘‘जब कोई स्त्री जो संतान आदि करने में समर्थ है, विधवा हो जाती है तब वह नियुक्त पति के साथ संतान उत्पत्ति के लिए नियोग कर सकती है।’’

उक्त मंत्रों में स्वामी दयानंद ने देवर ‘शब्द का अर्थ जहाँ ‘द्वितीय नियुक्त पति’ लिया है वहीं पाण्डेय जी ने देवर ‘शब्द का अर्थ ‘द्वितीय विवाहित पति’ लिया है।

 निरुक्त के संदर्भ में पाण्डेय जी ने लिखा है कि यास्क ने अपने निरूक्त में देवर ‘शब्द का निर्वचन ‘द्वितीय वर’ के रूप में ही किया है। उक्त मंत्रों के साथ पाण्डेय जी ने अथर्ववेद का भी एक मंत्र विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में प्रस्तुत किया है। 

जो निम्न है –

‘‘या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते परम्।
पत्र्चैदनं च तावजं ददातो न वि योषतः।।
समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः।
योऽजं पत्र्चैदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति।।’’
(अथर्वसंहिता 9-5-27,28)

उक्त से स्पष्ट है कि वेद भाष्यों में इतना अधिक अर्थ भेद और मतभेद पाया जाता है कि सत्य और विश्वसनीय धारणाओं का निर्णय करना अत्यंत मुश्किल काम है? यहाँ यह भी विचारणीय है कि विवाह का उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति करना ही नहीं होता बल्कि स्वच्छंद यौन संबंध को रोकना और भावों को संयमित करना भी है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि जो विषय (नारी और सेक्स) एक बाल ब्रह्मचारी के लिए कतई निषिद्ध था, स्वामी जी ने उसे भी अपनी चर्चा और लेखनी का विषय बनाया है।



बेहद अफसोस और दुःख का विषय है कि जहाँ एक विद्वान और समाज सुधारक को पुनर्विवाह और विधवा विवाह का समर्थन करना चाहिए था, वहाँ कथित समाज सुधारक द्वारा नियोग प्रथा की वकालत की गई है और इसे वर्तमान काल के लिए भी उपयुक्त बताया है। क्या यह एक विद्वान की घटिया मनोवृत्ति का प्रतीक नहीं है ?
 आज की फिल्में जो कतई निम्न स्तर का प्रदर्शन करती हैं, उनमें भी कहीं इस प्रथा का प्रदर्शन और समर्थन देखने को नहीं मिलता। स्वामी दयानंद को छोड़कर नवजागरण के सभी विद्वानों और सुधारकों द्वारा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया गया है।

जब किसी कौम या समाज के धार्मिक लोग जघन्य नैतिक बुराइयों और बिगाड़ में गर्क हो जाते हैं, तो वह कौम नैतिक पतन की पराकाष्ठा को पहुंच जाती है। नैतिक बुराइयों में निमग्न होने के बावजूद कथित धार्मिक लोग अपने बचाव और समाज में अपना स्तर और आदर-सम्मान बनाए रखने के लिए और साथ-साथ अपने को सही और सदाचारी साबित करने के लिए उपाय तलाशते हैं। अपने बचाव के लिए कथित मक्कार लोग अपनी धार्मिक पुस्तकों से छेड़छाड़ करते हैं और उनमें फेरबदल कर उस नैतिक बुराई को जो उनमें है, अपने देवताओं, अवतारों, ऋषियों, मुनियों और आदर्शों से जोड़ देते हैं और जनसाधारण को यह समझाकर अपने बचाव का रास्ता निकाल लेते हैं कि यह बुराई नहीं है बल्कि धर्मानुकूल है। ऐसा तो हमारे ऋषि-मुनियों और महापुरुषों ने भी किया है।

 नियोग के विषय में भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है। जब कौम में स्वच्छंद यौन संबंधों की अधिकता हो गई और जो बुराई थी, वह सामाजिक रस्म और रिवाज बन गई तो मक्कार लोगों ने उस बुराई को अच्छाई बनाकर अपने धार्मिक ग्रंथों में प्रक्षेपित कर दिया। प्राचीन काल में धार्मिक ग्रंथों में परिवर्तन करना आसान था, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों पर चन्द लोगों का अधिकार होता था। नियोग एक गर्हित और गंदी परंपरा है, इसे किसी भी काल के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति अत्यंत दयनीय प्रतीत होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि, मुनियों और महापुरुषों द्वारा कुछ ऐसे नियम-कानून बनाए गए, जिन्होंने नारी को भोग की वस्तु और नाश्ते की प्लेट बना दिया। नियोग प्रथा ने विधवा स्त्री को कतई वेश्या ही बना दिया। 
जैसा कि आप ऊपर पढ़ चुके हैं कि एक विधवा 10 पुरुषों से नियोग कर सकती है। यहाँ विधवा और वेश्या ‘शब्दों को एक अर्थ में ले लिया जाए तो ‘शायद अनुचित न होगा। विधवाओं की दुर्दशा को चित्रित करने वाली एक फिल्म ‘वाटर’ सन् 2000 में विवादों के कारण प्रतिबंधित कर दी गई थी, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर विधवाओं को वेश्याओं के रूप में दिखाया गया था। प्रायः विधवा स्त्रियाँ काशी, वृन्दावन आदि तीर्थस्थानों में आकर मंदिरों में भजन-कीर्तन करके और भीख मांगकर अपनी गुजर बसर करती थी, क्योंकि समाज में उनको अशुभ और अनिष्ट सूचक समझा जाता था।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी जी ने भी इस दशा का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘‘वृंदावन जब था तब था अब तो वेश्यावनवत्, लल्ला-लल्ली और गुरु-चेली आदि की लीला फैल रही है। (11-159), 

आज भी काशी में लगभग 16000 विधवाएं रहती हैं।

‘मनुस्मृति’ में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं।
 (3-21)
 इनमें आर्ष, आसुर और गान्धर्व विवाह को निकृष्ट बताया गया है मगर ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और मर्मज्ञों ने इनका भरपूर फायदा उठाया। 

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, मुनि पराशर, कौरवों-पांडवों के पूर्वज पाण्डु पुत्र अर्जुन और भीम आदि ने उक्त प्रकार के विवाहों की आड़ में नारी के साथ क्या किया ? 

इसका वर्णन भारतीय ग्रंथों में मिलता है।

भारतीय ग्रंथों में नारी को किस रूप में दर्शाया गया है आइए अति संक्षेप में इस पर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं।

1. ‘‘ढिठाई, अति ढिठाई और कटुवचन कहना, ये स्त्री के रूप हैं। जो जानकार हैं वह इन्हें ‘ाुद्ध करता है।’’ (ऋग्वेद, 10-85-36)

2. ‘‘सर्वगुण सम्पन्न नारी अधम पुरुष से हीन है।’’
(तैत्तिरीय संहिता, 6-5-8-2)

3. नारी जन्म से अपवित्र, पापी और मूर्ख है।’’ (रामचरितमानस)

उक्त तथ्यों के आधार पर भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति और दशा का आकलन हम भली-भांति कर सकते हैं। भारतीय ग्रंथों में नारी की स्थिति दमन, दासता और भोग की वस्तु से अधिक दिखाई नहीं पड़ती। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या आधुनिक भारतीय नारी चिंतकों की सोच अपने ग्रंथों से हटकर हो सकती है ? 

आइए भारतीय संस्कृति में नारी की दशा का आकलन करने के लिए छांदोग्य उपनिषद् के एक मुख्य प्रसंग पर भी दृष्टि डाल लेते हैं।

नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि, बह्वहं चरन्ती
परिचारिणी यौवने त्वामलमे साहमेतन्न वेद यद्
गोत्रत्वमसि, जाबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम
त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति।
(छांदोग्य उपनिषद् 4-4-2)

यह प्रसंग सत्यकाम का है। जिसकी माता का नाम जबाला था। सत्यकाम गौतम ऋषि के यहाँ विद्या सीखना चाहता था। जब वह घर से जाने लगा, तब उसने अपनी माँ से पूछा ‘‘माता मैं किस गोत्र का हूँ ?’’ उसकी माँ ने उससे कहा, ‘‘बेटा मैं नहीं जानती तू किस गोत्र का है। अपनी युवावस्था में, जब मैं अपने पिता के घर आए हुए बहुत से अतिथियों की सेवा में रहती थी, उस समय तू मेरे गर्भ में आया था। मैं नहीं जानती तेरा गोत्र क्या है ? मेरा नाम जबाला है, तू अपना सत्यकाम है,
क्या उपरोक्त उद्धरणों से तथ्यात्मक रूप से यह बात साबित नहीं होती कि स्त्री को केवल भोग की वास्तु तथा नास्ते की प्लेट समझा गया है…?

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महाअज्ञानी दयानन्द का महाअज्ञान Part-01

महर्षि  दयानन्द का  महाअज्ञान

देखिये पूरी कहानी The EnD तक

नोटः- हमारा  उद्देश्य किसी की निंदा करना नही है बल्कि सच्चाई से अवगत कराना है ।

स्वामी दयानन्द द्वारा रचित “सत्यार्थ प्रकाश ” में
समाजनाश की झलक —

 ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ का ज्ञान।

कृपया देखें समुल्लास-4 प ष्ठ-70
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
समु.-4 पृष्ठ-71पर लिखा है

कि कैरी आँखों वाली लड़की से विवाह मत करो, 
दांत युक्त लड़की से विवाह करो, किसी का नाम पार्वती, गोदावरी, गोमति आदि नदियों और पर्वतों पर हो उस लड़की से विवाह मत करो।

क्या महर्षि दयानन्द के विद्यान अनुसार बच्चों का विवाह हो सकेगा?

नोट – करे फिर तो शिव ने भी गलती कर दी पार्वती से शादी करके..

सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास-4 पृष्ठ-71 पर ही लिखा है 
~~~~~~~~~~~~~~~~~

कि 24 वर्ष की स्त्री 48 वर्ष के पुरूष का विवाह करना उत्तम है। 

क्या ये सही है ?

 सत्यार्थ प्रकाश>>

समुल्लास-4 प ष्ठ-70 पर लिखा है

  विवाह के समय पिता के गोत्र तथा माता के कुल  (गोत्रा) की छः पीढियों को छोड़ कर लड़के -लड़की का विवाह करें।

जिस किसी कुल में किसी एक व्यक्ति को निम्न रोगों में से एक भी रोग हो तो उस पूरे कुल के लड़के तथा लड़की से विवाह न करें। वे रोग हैं:-

बवासीर, दमा, खांसी, अमाश्य (पेट की गड़बड़ी) मिरगी, श्वेत कुष्ट और गलित कुष्ट रोग तथा जिन व्यक्तियों के शरीर पर बड़े-2 बाल हों उनके पूरे कुल को त्याग दें।  जो वेदों का अध्ययन न करते हों उनके कुल को त्याग दें।

नोट – अगर ये रोग विवाह के बाद हो जाये तो क्या
बीवी बच्चो को छोड दे.

 सत्यार्थ प्रकाश>>

फिर महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास-8 पृष्ठ
197,198 पर लिखा है 

सूर्य पर पृथ्वी की तरह सब प्रजा बसती हैं। इसी प्रकार सर्व पदार्थ हैं। इन्हीं वेदों को सूर्य (आग के गोले) पर रहने वाले मनुष्य पढ़ते हैं।

क्या सूर्य पर कभी प्रजा हो सकती है ?

वेद गीता या कौन सी किताब मे लिखा
है ऐसा..

सत्यार्थ प्रकाश  पेज 101 पर लिखा है 

 “महिला अगर गर्भवती है तो पुरुष उस महिला के साथ 1 वर्ष तक सम्भोग न करे , अगर न रहा जाये ?
तो किसी विधवा स्त्री से “नियोग ” सम्भोग कर लेवे और संतान उत्पत्ति कर लेवे”

{स्म्मुलास ४ पृष्ट 101 }
स्वामी दयानन्द ने विधवा विवाह न करने का कारण
बताया है ” पुन : विवाह करने से स्त्री का पतिव्रता धर्म नष्ट हो जायेगा “

 पृष्ट 99 स्म्मुलास ४ में ही लिखा है

विधवा स्त्री ग्यारह पुरुषों के साथ नियोग { सम्भोग }
पशु तुल्य व्यवहार कर सकती है !

वाह रे दयानन्द क्या यह कुकर्म करने के बाद उस
स्त्री का पतिव्रता धर्म सुरक्षित रहेगा ?



सत्यार्थ प्रकाश के सम्मुल्लास चार के पेज 100 पर लिखा है  

अगर किसी महिला का पति विदेश में धन कमाने के लिए गया हो ! तो वह महिला तीन साल पति का इंतजार करे उसके बाद किसी दुसरे पुरुष के साथ :” नियोग” {सम्भोग } करके बच्चा पैदा कर ले ! 

अगर किसी कारण वश दुसरे पुरुष से गर्भ धारण न हो तो तीसरे आदमी से , और उस से भी न हो तो , चोथे -पांचवे -छ्टे अर्थात ग्यारहवें पुरुष से सम्बन्ध बना कर
बच्चा उत्पन्न कर ले ! और दुसरे या ग्यारहवें पुरुष से प्राप्त हुई संतान उसके पति कि ही मानी जाएगी !!


क्या ये सही है ? आप लोगों से अपील है सत्यार्थ परकाश को ध्यान से पडें और विचार करे

सत्यार्थ प्रकाश समु.-4 के पृष्ठ- 96,97 पर महर्षि दयानन्द ने लिखा है

 विधवा स्त्री का पुनः विवाह इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि पुनःविवाह से उसका पति व्रत धर्म नष्ट हो जाएगा। इसलिए नियोग करें।

महर्षि दयानन्द का नियोग नियम:>
=========================

स्त्री यदि विधवा हो जाए तो उसको चाहिए कि वह किसी अन्य पुरूष से गर्भ धारण करले। वह सन्तान स्त्री के विवाहित पति की ही मानी जाएगी। उसी का गोत्र होगा। वीर्य दाता का नहीं। 

गर्भ धारण (करने के) पश्चात् उस स्त्री व गैर पुरूष का कोई नाता न रहे बच्चों की परवरिश भी अकेली स्त्री स्वयं करें। वीर्य दाता बच्चों के पालन में कोई सहयोग न दे। अपने- अपने घर में रहें।

सत्यार्थ प्रकाश  पेज 101 पर लिखा है 

महिला अगर गर्भवती है तो पुरुष उस महिला के साथ 1 वर्ष तक सम्भोग न करे , अगर न रहा जाये ?
तो किसी विधवा स्त्री से “नियोग ” सम्भोग कर लेवे और संतान उत्पत्ति कर लेवे 


सत्यार्थ प्रकाश  समु.- 4 पृष्ठ-102 पर ही लिखा है

यदि किसी का पति मारता पीटता हो तो उस स्त्री को चाहिए कि वह किसी अन्य पुरूष के पास जाकर गर्भ धारण करले तथा सन्तान उत्पति करले।

वह गैर सन्तान भी विवाहित जीवित पति की मानी जाएगी। उसकी सम्पत्ति की भागीदार मानी जाएगी।

समु.-4 के पृष्ठ- 96,97 पर महर्षि दयानन्द ने लिखा है

 विधवा स्त्री का पुनः विवाह इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि पुनःविवाह से उसका पति व्रत धर्म नष्ट हो जाएगा। इसलिए नियोग करें।

सत्यार्थ प्रकाश  समुल्लास-4 पृष्ठ-82पर लिखा है

नवजात बच्चे को माता केवल छः दिन दूध पिलाए फिर अपने स्तनों से दूध बन्द करने के लिए कोई पदार्थ लगाए। 
बच्चे को दूध पिलाने के लिए ऐसी दाई रखो जिसके स्तनों में दूध हो वह उस नवजात बच्चे को अपना दूध पिलाए। 

विचार करें यदि एक गांव में एक दिन तीन-चार स्त्रियों को बच्चा उत्पन्न हो जाऐं तो इतनी दाई कहां से
उपलब्ध होगी। एक दाई कोई मिल्क प्लांट नहीं है कि सर्व बच्चों को दूध पिला देगी या ये जरूरी नही
उसी समय सर्व दाईयाँ भी बच्चों को जन्म दें।  

फिर दयानन्द के विधान अनुसार वे अपने बच्चों को पालेंगी या अन्य के बच्चों को ?


महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के समु.-4 पृष्ठ-102

अपने अनुयाईयों की सुहागिन स्त्रियों को भी आदेश दिया है कि वे भी किसी गैर पुरूष से पशु तुल्य कर्म अर्थात् नियोग करें, 

लेकिन निम्न परिस्थितियों में:- यदि किसी का पति धन कमाने विदेश गया हो और तीन वर्ष घर न आए
तो वह स्त्री किसी गैर पुरूष से गर्भधारण करके सन्तान  उत्पति करले। वह सन्तान उसके जीवित विवाहित पति की ही मानी जाएगी।

समुल्लास-7 पृष्ठ-154पर लिखा है

परमात्मा निराकार है।

समुल्लास-7 पृष्ठ-155 तथा 163 पर लिखा है कि 

परमात्मा साधक के पाप नाश नहीं कर सकता।

महर्षि दयानन्द का यह भी कहना है कि ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ में वेदों का ज्ञान ही सरल करके लिखा है।

जबकि यजुर्वेद अध्याय-8 मंत्र 13 में छः बार लिखा है कि परमात्मा दान देने वाले अपने भक्त के घोर पाप
को भी नाश कर देता है। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ वेद विरूद्ध ज्ञान युक्त है अर्थात् “”झूठार्थ प्रकाश”” है।

पुस्तक ‘‘श्रीमद्दयानन्द
Prakash ka पेज 445… 

Ye Pustak सार्वदेशिक आर्य
प्रतिनिधी सभा 3/5 महर्षि दयानन्द भवन नई
दिल्ली से प्रकाशित है।

इसमे लिखा है
 महर्षि दयानंद का मल-मूत्र वस्त्रों में ही निकल जाता था। दयानन्द को अतिसार (दस्त) लगे हुए थे। 
ठाकुर भूपाल सिंह के हाथों पर ही कई बार मल- मूत्र
निकल जाता था।

 इस प्रकार महापीड़ा को भोगकर, भुगत कर, म्रत्यु को प्राप्त हुआ महर्षि दयानन्द। 

धिक्कार है ऐसी भक्ति साधना को तथा महर्षि को जिससे भक्त के पाप कर्म का कष्ट समाप्त नहीं हुआ। 

महर्षि दयानन्द की दुर्गति



पुस्तक दयानन्द चरित के प ष्ठ 216 तथा 217 Per dekhe.
‘‘दयानन्द चरित’’ नामक Pustak जिसके लेखक है
श्री देवेन्द्र नाथ मुखोपाध्याय जिन्होंने सन् 1897 में
(2000-103=1897) बंगला भाषा में लिखा था। इसका अनुवाद सन् 2000 में 103 वर्ष पश्चात् बाबू घासी राम एम.ए., एल.एल.बी. ने हिन्दी में किया। जिस पुस्तक के सम्पादक हैं। डा.(प्रो.) भवानी लाल भारतीय।  इसमें  प्र ष्ठ 216 में लेखक ने स्पष्ट किया
है

” आश्विन मास (आसौज महिने) की बदी एकादशी को महर्षि दयानन्द को ठण्ड लग गई थी। जिस कारण से शरीरअस्वस्थ था। इसलिए चौदह को रात्री में केवल दूधपीकर सोया।  रात्री में उल्टियाँ लगी। फिर डाक्टरों का आना आरम्भ हुआ।

लेकिन दवाईयों से कोई लाभ नहीं मिला, पेट का दर्द बढ़ता चला गया। स्वांस लेना भी कठिन हो गया। इससे से स्पष्ट हुआ कि महर्षि दयानन्द की म त्यु कांच या
विष देने से नहीं हुई बल्कि ठण्ड लगने से हुई तथा पाप
बढ़ जाने के कारण से हुई। “

दूसरी पुस्तक श्रीमद्दयानन्द प्रकाश में आप पढ़ेंगे कि 

यह व्यक्ति किस तरह दुर्गति को प्राप्त होकर मरा? जिसे पढ़कर कलेजा मुंह को आता है।

पुस्तक दयानन्द चरित के पेज 217 में आप स्वयं पढ़ें महर्षि दयानन्द की दुर्दशा।
….
यदि दयानंद महान योगी तथा साधक था तो फिर वो नकली महर्षि दयानंद 40 दिनोँ तक अपने वस्त्रोँ मेँ टट्टी पेशाब करके तड़प तड़प कर बुरी दुर्गति से क्योँ मरा था ? अपनी योग साधना से वो क्योँ अपने बुरे कर्मोँ के फलोँ को नष्ट नहीँ कर पाया ?

दयानंद के हिँसक समाजियो याद रखना जिस योग साधना से दयानंद तड़प तड़प कर मरा था यदि वही साधना उसके हिँसकसमाजियोँ ( दयानंद के चेले ) ने
की तो वही हाल होगा जो गुरु का हुआ ! समझदार को ईशारा काफी ।

दयानन्द की महाअज्ञानता

दयान्नद ने गायत्री मंत्र की नकल की है कही से उसको खुद भी नही मालूम गायत्री मंत्र क्या है.. चलो हम बता देते है…

 जिसको आर्य समाज गायत्री मंत्र बोलता है वो कोई मंत्र नही है

 बल्कि ” यजुर्वेद अध्याय 36 का श्लोक 3″ है जिसमे ओम् नही है ..

ओम इन लोगो ने अपने घर से लगाया है .. वेद ज्ञान दाता ने ओम नही लगाया है.. ओम को किसी के साथ लगाकर जाप करना वेद और गीता ज्ञान दाता के विधान को तोडना है…

विवेचन:- हिन्दुओं द्वारा नित्य जाप किए जाने वाले
गायत्री मंत्र का किसी को पता नहीं था कि यह गायत्री मन्त्र कहां से उद्घ त किया गया है। 

महर्षि दयानन्द ने अपने द्वारा लिखी पुस्तक ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ के समुल्लास-3 पेज-38 पर

(वैदिक यति मण्डल दयानन्द मठ दीनानगर से प्रकाशित तथा आचार्य प्रिन्टिंग प्रैस
दयानन्द मठ गोहाना मार्ग रोहतक से मुद्रित) 

गायत्री मन्त्र का उल्लेख किया है, लिखा है 

‘‘भूः भुवः स्वः’’ ये तीन वचन तैतरीय आरण्यक के हैं। मंत्र के शेष भाग के विषय में महर्षि दयानन्द मौन है। उन्हें यह नहीं पता कि यह कहां से लिया गया है। 

इससे सिद्ध हुआ कि महर्षि दयानन्द को वेद ज्ञान नहीं था।
यदि वेद ज्ञान होता तो स्पष्ट कहता कि यह मंत्र जिसे
गायत्री मंत्र कहते हैं, यजुर्वेद अध्याय-36 का मंत्र
तीसरा है। 

‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ की रचना सन् 1875में करके, समाज में पढ़ने के लिए प्रवेश कर दिया। उसके दो
वर्ष बाद वेदों का अनुवाद करना प्रारम्भ किया। 

यजुर्वेद का अनुवाद जनवरी सन् 1877 में प्रारम्भ किया तथा नवम्बर 1882को छः वर्ष में पूरा किया।

 यजुर्वेद अध्याय-36 के मंत्र 3 का अनुवाद महर्षि दयानन्द का अपना ज्ञान है तथा सत्यार्थ प्रकाश में इसे गायत्री मंत्र बनाकर अनुवाद लिखा है

यह महर्षि दयानन्द ने किसी की नकल करके लिखा है। इसलिए एक दूसरे से मेल नहीं करता।
जब महर्षि दयानन्द यजुर्वेद का अनुवाद कर रहा था। इसको यह भी याद नहीं था कि मैंने इस मंत्र का
अनुवाद सत्यार्थ प्रकाश में क्या किया है? 

इससे सिद्ध है कि महर्षि दयानन्द का ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ का ज्ञान वेद ज्ञान विरूद्ध है। 

क्योंकि सत्यार्थ प्रकाश में लिखे गायत्री मंत्र के अंश का ज्ञान कराया है कहा है कि ये तीन वचन
(भूः भुवः स्वः) तैतरीय आरण्यक के हैं। यदि वेद ज्ञान होता तो लिखता कि यह मंत्र यजुर्वेद अध्याय-36 मंत्र-3 है

भँगेडी नशेडी दयानन्द


 दयानंद जी भांग पीता था तथा सभी प्रकार के नशा भी करता था .. फिर भी उनके चेले उन्हेंसमाज सुधारक  का तमगा देते रहते है .. दयानंद जी नशेडी था इसके ढेरो प्रमाण है
..
आर्यसमाज की ही पुस्तको में ढेरो अधिक प्रमाण देखने के आप जी जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी द्वारा लिखित इस धरती पर अवतार” नामक pdf पुस्तक
का अध्ययन करे — इस पुस्तक में दयानन्द के अज्ञान
की विस्त्रत प्रमाणित जानकारी दे
रक्खी है |

पुस्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन चरित्र के पेज 50 
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यह फोटो कापी महर्षि दयानन्द के भक्तों द्वारा लिखे
गये ‘‘जीवन चरित्र’’ की है। जो पहले उर्दू भाषा में पं. लेखराम द्वारा लिखा गया था। उस उर्दू संस्करण
का हिन्दी में अनुवाद स्व. कविराज रघुनन्दन सिंह ‘निर्मल’ ने किया है।

 इसमें स्पष्ट लिखा है कि महर्षि दयानन्द ने स्वयं अपने
द्वारा लिखी जीवनी में कहा है कि 

मुझे भांग पीने का दोष लग गया। उसके प्रभाव से पूर्ण रूप से बेसुध हो जाता था और योग अभ्यास भी करता था।

विचार करें:- ऐब करने वाला व्यक्ति साधना कर सकता है? बेसुध व्यक्ति अभ्यास रत हो सकता है?
इस प्रकार का व्यक्ति था, यह महर्षि दयानन्द। जो सर्व बुराई करता था, लेकिन दावा करता था, समाज सुधार का

दयान्नद 3 साल के लिए Underground 

महर्षि दयानन्द स्वतन्त्रता संग्राम में डर कर
तीन वर्ष लापता रहा:-
पुस्तक ‘नवजागरण के पुरोधा दयानन्द सरस्वती ‘ के पेज 38 की Per Dekhe….

 नकली आर्यसमाजी (दयानंद के चेले ) अपनी छाती कूट कूट के बड़ी शान से कहते है कि महर्षि दया नन्द ने १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ा योगदान दिया था ! ये देखो इस नकली महर्षि की असलियत
—-
महर्षि दयानन्द स्वतन्त्रता संग्राम में डर कर
तीन वर्ष लापता रहा:-
महर्षि दयानन्द के भक्तों द्वारा वैदिक पुस्तकालय,
परोपकारिणी सभा, दयानन्दाश्रम, अजमेर
(राजस्थान) से प्रकाशित ’’ नवजागरण के
पुरोधा दयानन्द सरस्वती’’ में
स्पष्ट किया है कि

 महर्षि दयानन्द मार्च 1857 तक तो गंगा नदी के साथ-2 घूमता रहा। जब मई 1857 में स्वतन्त्रता संग्राम की तैयारी चल रही थी, उसी समय लापता हो
गया। फिर तीन वर्ष तक उसका कहीं पता नहीं लगा। जून 1857 में स्वतन्त्रता संग्राम हुआ। उसके भय से छुप गया। 

महर्षि की फोकट महिमा बनाई जाती रही कि स्वतन्त्रता संग्राम में महर्षि दयानन्द का बड़ा योगदान रहा। 

विचार करें:- क्या खाक योगदान था स्वतंत्रता संग्राम में, उन दिनों भांग पीकर डर के मारे जंगलों में छुपा रहा और महर्षि दयानन्द के समर्थक कहते हैं कि परमात्मा की खोज में दयानन्द जंगलों, पहाड़ों, गुफाओं में गया।

विचार करें परमात्मा कोई गाय-भैंस थोड़े ही है, कि गुम हो गई और वह कहीं जंगल में खोजने गया था।

 परमात्मा वेदों में वर्णित विधानुसार मिलता है और वेद ज्ञान महर्षि दयानन्द की बुद्धि से परे की बात थी। जिस कारण से अपना अज्ञान अनुभव जो वेद ज्ञान विरूद्ध है ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ में भर दिया जो आप के समक्ष है।”

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